
Dukh Dur Karne Ke Upay। Sadness कैसे दूर करें।
क्यों दुःख मिलने पर हम असहज हो जाते हैं ? दुःख हमे पकड़ता है कि दुःख को हम ही पकड़े रहते हैं।
दुःख दूर करने के उपाय क्या हैं। Dukh Dur Karne Ke Upay
दुःख एक ऐसा भाव है जो जब छा जाता है तो फिर छाया ही रहता है। Dukh Dur Karne Ke Upay
दुःख कब आता है कैसे आता है लेकिन जब भी आता है कभी थोड़ी देर में चला जाता है कभी तो
बिलकुल ही टिक कर बैठ जाता है। दुःख दूर करने के उपाय में कैसे सबसे बड़ा उपाय हैमानसिक जागरण।
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मानसिक जागरण – Dukh Dur Karne Ke Upay
दुःख दूर करने के उपाय हम सभी खोजते रहते हैं लेकिन हल वहीँ हैं जहाँ से दुःख निकलता है। और वो जगह है मन।
आज मन उदास है, आज बहुत उदास है। ये बात अक्सर हम कहते रहते हैं लेकिन ये कभी नही सोचते की
क्या ये हम ही हैं,जो दुःख के सूत्रधार बने बैठे हैं ?
क्या ये हम ही हैं जिसके कारण दुःख या तो चला जाता है या फिर टिका रहता है ।
क्या ये हम ही हैं जो दुःख को बढ़ाते या घटाते हैं ?
उत्तर – Dukh Dur Karne Ke Upay
जवाब गहराई से सोचने पर सदैव यही मिलेगा की हाँ! सच तो यही है कि दुःख का कारण भी हम हैं और
उसका हल यानी निवारण भी हम ही हैं तो असली प्रश्न क्या निकला असली प्रश्न तो यही है कि
क्यों हमे पता नहीं चलता कि दुःख को रोकने और बढ़ाने वाले हम हैं।
सजगता – Dukh Dur Karne Ke Upay
इतनी बड़ी गलती कैसे हो जाती है। यदि मात्र इतना जान भी लें हम तो भी दुःख पर रोक लगनी शुरू हो जाती है।
लेकिन रोज़हमारे साथ ये होता है और रोज़ हम इस बात को जानने, समझने के बजाय दुःख में डूबने लगते हैं।
स्वयं को असहाय पाते हैं। अपने दुःख को दूर करने के लिए दूसरों का आसरा तलाशने लगते हैं।
हमे लगता है काश कोई मिल जाए जो हमारे दुःख को समाप्त कर दे।
काश ऐसा हो कि ये दुःख मेरा कम हो जाए या
काश ऐसा हो कीदुःख मुझे मिले ही ना।

भ्रम –
दुःख दूर करने के उपाय। हम एक काल्पनिक पिंजरे जैसा अपने मन को समझते हैं और उसमे
खुद को कैद पाते हैं।दुःख उस पिंजरे कि सांकल के सामान है जिससे उस पिंजरे का दरवाज़ा बंद है।
बस हम उसी पिंजरे में अपनी जिंदगी बिताते चले जाते हैं। हम ये मानकर जीते हैं कि दुःख
हमारी नियति है , ये मिलना ही है। इसे रोका नहीं जा सकता, इसे तो गुज़ारना ही पड़ेगा।
नतीजा दुःख बढ़ता जाता है। हमारा मनोबल टूटता जाता है। हम अन्धकार में रहकर गहरे
अन्धकार से बचने कि अथक चेष्टा में लगे रहते हैं।
वास्तविकता
Dukh Dur Karne Ke Upay
लेकिन जिस दिन, जिस दिन पल हम ये समझ जाते हैं कि ऐसा कोई पिंजरा है ही नहीं।
जिस दिन मे ये भली भांति अनुभव हो जाता है कि मन के अधीन हम नहीं बल्कि मन हमारे
अधीन है। उस दिन, उसी पल हमे ये भी पता चल जाता है कि दुःख कि कोई सांकल नहीं।
दुःख तो हमारे भावों का एक प्रक्षेपण है जो विचारों द्वारा हमारे मस्तिष्क में उत्पन्न होता है।

जानकारी का अभाव
जैसे एक माचिस है जिसमे तीलियाँ हैं लेकिन यदि हमे ये पता नहीं कि इस माचिस कि तीली से
अग्नि उत्पन्न हो सकती है और हम इसे अपने काम में ले सकते हैं। इस जानकारी के ना होने पर
वो माचिस रखी रह जाती है और हम आग के लिए इधर उधर भागते रहते हैं।
उसी प्रकार दुःख हमारे मन के भावों कि उपज है और हम ही हैं जिससे हमारा मन और भाव नियंत्रित
होते हैं। इस जानकारी के मिलते ही हमारा दुःख तुरंत ही कम होने लगता है।
दुःख से कितनी जल्दी निकल सकते हैं।

ये निर्भर करता है कि कितनी गहराई में हम पहुँच चुके हैं और कितनी गहराई तक हमने इस तथ्य का
यानी उपरोक्तजानकारी का अनुभव कर लिया है। यदि हमने उतनी ही गहराई से इस तथ्य का अनुभव
कर लिया है जितनी गहराई में हमदुःख में हैं तो हम दुःख से तुरंत ही निकल जाएंगे।
लेकिन ये इतना आसान नहीं होता यदि हम गहरे अवसाद में पहुँच गए हों।
इसके लिए निरंतर इस सजगता को बनाये रखना होगा कि हम ही अपनी भावनाओं के मालिक हैं।
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